198 / 328
Dil Apna Aur Preet Parai · 1960
Lyrics
अजीब दास्ताँ है ये कहाँ शुरू कहाँ ख़त्म ये मंज़िलें हैं कौन सी न वो समझ सके न हम अजीब दास्ताँ है ये कहाँ शुरू कहाँ ख़त्म