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· 1976
Lyrics
## षहिर्'स टल्खियान ## कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है कि ज़िंदगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाओं में गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी यह तिरागी जो मेरे ज़ीस्त का मुकद्दर है तेरी नज़र की शुआँओं में खो भी सकती थी बिग्स्किप अजब न था कि मैं बेगाना-ए-आलम हो कर तेरे जमाल की रानाइयों में खो रहता तेरा गुद्।ह्दाज़ बदन, तेरी नीमबाज़ आँखें इन्हीं हसीन फ़ज़ाओं में मैं हो रहता बिग्स्किप पुकारतीं मुझे जब तलख़ियाँ ज़माने की तेरे लबों से हलावत के घूँट पी लेता हयात चीखती फिरती बरेहना-सर और मैं घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाओं में छुप के जी लेता बिग्स्किप मगर ये हो न सका मगर ये हो न सका और अब ये आलम है कि तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तुज़ू भी नहीं गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िंदगी जैसे इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं बिग्स्किप ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले गुज़र रहा हूँ कुछ अनजानी रहगुज़ारों से मुहीब साये मेरी सिमट भरते आते हैं हयात्-ओ-मौत के पर्-हाल खार्-ज़ारों से बिग्स्किप न कोई जदा, न मंज़िल, न रोशनी का सुराग भटक रही है ख़यालों में ज़िंदगी मेरी इन्हीं ख़यालों में रह जाऊँगा कभी खो कर मैं जानता हूँ मेरे हम्-नफ़स, मगर यूँ हीं कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है