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· 1964
Lyrics
मन रे तू काहे ना धीर धरे वो निर्मोही मोह ना जाने, जिनका मोह करे मन रे ...
इस जीवन की चढ़ती ढलती धूप को किसने बांधा रंग पे किसने पहरे डाले रुप को किसने बांधा काहे ये जतन करे मन रे ...
उतना ही उपकार समझ कोई जितना साथ निभा दे जनम मरण का मेल है सपना ये सपना बिसरा दे कोई न संग मरे मन रे ...