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· 1965
Lyrics
ख़्वाब हो तुम या कोई हक़ीक़त कौन हो तुम बतलाओ देर से कितनी दूर खड़ी हो और करीब आ जाओ
सुबह पे जिस तरह्, शाम का हो गुमार - (२) ज़ुल्फ़ों में एक चेहरा, कुछ ज़ाहिर कुछ निहार
धड़कनों ने सुनी, एक सदा पाओं की - (२) और दिल पे लहराई, आँचल की छाओं सी
मिल ही जाती हो तुम्, मुझको हर मोड़ पे - (२) चल देती हो कितने, अफ़साने छोड़ के
फिर पुकारो मुझे, फिर मेरा नाम लो - (२) गिरता हूँ फिर अपनी, बाहों में थाम लो